संयुक्त राष्ट्र समर्थित 1951 शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए छह शरणार्थियों ने अपनी जीवन यात्रा साझा की। इन लोगों ने बताया कि युद्ध, राजनीतिक हिंसा, धार्मिक उत्पीड़न और मानवाधिकारों के उल्लंघन के कारण उन्हें अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के अनुसार, यह संधि पिछले 75 वर्षों से लाखों लोगों के जीवन की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा का आधार रही है, लेकिन आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोग विस्थापन और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।

इस अवसर पर साझा की गई कहानियों में निकारागुआ, सूडान, म्यांमार, सीरिया और यूक्रेन सहित कई देशों से आए शरणार्थियों के अनुभव शामिल हैं। इन लोगों ने बताया कि अपने देश से पलायन के बाद उन्हें नई भाषा, नई संस्कृति और रोजगार जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्तमान में दुनिया भर में 4.1 करोड़ से अधिक शरणार्थी अपने घरों से विस्थापित हैं और इनमें से लगभग 70 प्रतिशत शरणार्थियों को निम्न एवं मध्यम आय वाले देश शरण दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सूडान, यूक्रेन, गाजा, म्यांमार और अन्य संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में जारी हिंसा के कारण आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस 75वीं वर्षगांठ पर सभी देशों से शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराने की अपील की है। संगठन का कहना है कि हाल के वर्षों में कई देशों ने शरण चाहने वालों के प्रवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय शरण प्रणाली पर दबाव बढ़ा है। UNHCR ने “The Promise” नामक वैश्विक अभियान भी शुरू किया है, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में शरणार्थियों के प्रति एकजुटता बढ़ाना और सुरक्षित आश्रय के अधिकार को मजबूत करना है। संस्था ने जोर देकर कहा कि बदलते वैश्विक हालात में 1951 की यह संधि आज भी मानवता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।
